प्राचीन भारतीय विज्ञान के 10 विस्मृत आविष्कार जो आज भी चौंकाते हैं

प्राचीन भारतीय विज्ञान और आविष्कार - अगस्त्य संहिता, वूट्ज़ स्टील, दिल्ली लौह स्तंभ

वैश्विक विज्ञान के इतिहास में प्राचीन भारत का योगदान केवल दार्शनिक या आध्यात्मिक चिंतन तक सीमित नहीं था, बल्कि वह व्यावहारिक भौतिकी, उन्नत धातुकर्म, परिष्कृत ज्यामिति, और जटिल शल्य चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में भी अत्यधिक समृद्ध था। औपनिवेशिक काल के इतिहासलेखन और यूरो-केंद्रित वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण भारत के कई अभूतपूर्व आविष्कार और वैज्ञानिक सिद्धांत समय की धुंध में ओझल हो गए। यह लेख प्राचीन भारत के ऐसे ही दस अत्यंत महत्वपूर्ण परंतु विस्मृत आविष्कारों और वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्राथमिक ग्रंथों, पुरातात्विक साक्ष्यों और आधुनिक प्रयोगशाला परीक्षणों के प्रकाश में विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

1. विद्युत रासायनिक सेल और प्राचीन बैटरी तकनीक (Agastya's Electrochemical Cell)

आधुनिक विज्ञान में विद्युत सेल (Electric Cell) के आविष्कार का श्रेय आमतौर पर वर्ष 1800 में एलेसेंड्रो वोल्टा द्वारा बनाए गए वोल्टाइक पाइल को दिया जाता है। हालांकि, संस्कृत के प्राचीन ग्रंथ 'अगस्त्य संहिता' के तकनीकी विनिर्देशों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि महर्षि अगस्त्य ने रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने की प्रणाली का विकास बहुत पहले ही कर लिया था। इस प्राचीन वैज्ञानिक विलेख की खोज वर्ष 1924 में उज्जैन के एक शाही पुस्तकालय में हुई थी, जिसे बाद में भारतीय रसायनज्ञ डॉ. वरम वेंकट कोकटानूर द्वारा डेट्रॉइट, मिशिगन में अमेरिकन केमिकल सोसायटी (American Chemical Society) की बैठक में अकादमिक रूप से प्रस्तुत किया गया।

अगस्त्य संहिता में संकलित सूत्र इस रासायनिक विद्युत उत्पादन प्रणाली को निम्नलिखित रूप में परिभाषित करता है:

संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥

इस श्लोक में वर्णित घटक और उनकी रासायनिक भूमिका आधुनिक सेल संरचना के समतुल्य मानी जाती है:

संस्कृत शब्दावली रासायनिक/तकनीकी अर्थ आधुनिक सेल में भूमिका
मृण्मये पात्रेमिट्टी का बर्तनबाह्य रासायनिक रोधन आवरण
ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌परिष्कृत तांबे की प्लेटकैथोड (धनात्मक इलेक्ट्रोड)
शिखिग्रीवकॉपर सल्फेट घोल (CuSO₄)विद्युत अपघट्य
काष्ठापांसुभि:गीला लकड़ी का बुरादाआयनिक विसरण नियंत्रक विभाजक
पारदाच्छादित दस्तालोष्टोअमलगम लेपित जस्ते की प्लेटएनोड (ऋणात्मक इलेक्ट्रोड)

इस सेल की रासायनिक स्थिरता के लिए जस्ते पर पारे का लेप (Amalgamation) किया जाता था, जो ध्रुवीकरण (Polarization) और स्थानीय क्रिया (Local Action) जैसी विनाशात्मक प्रतिक्रियाओं को रोकने के लिए प्रयुक्त एक परिष्कृत तकनीक बताई जाती है। नागपुर में स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्थान में इस सेल के व्यावहारिक निर्माण में 1.138 V का ओपन सर्किट वोल्टेज और 23 mA की शॉर्ट सर्किट धारा दर्ज की गई।

इस प्रक्रिया से उत्पन्न विद्युत ऊर्जा को 'मित्रावरुण शक्ति' कहा गया, जिसमें 'मित्र' कैथोडिक ध्रुवता और 'वरुण' एनोडिक ध्रुवता को दर्शाता है। सौ ऐसे घटकों को श्रृंखला में जोड़कर जल का विद्युत अपघटन कर पानी को 'प्राणवायु' (ऑक्सीजन) और 'उदानवायु' (हाइड्रोजन) में विभाजित करने का भी विवरण मिलता है, जिसका उपयोग हाइड्रोजन गुब्बारों या 'आकाश यान' के निर्माण में बताया गया है। इस प्रणाली की एक ऐतिहासिक पुष्टि लंदन प्रोटेस्टेंट मिशन के रेवरेंड एस. मेटियर के उस विवरण से भी जुड़ती है, जिसमें उन्होंने 19वीं सदी के अंत में त्रावणकोर के एक मंदिर के कुएं में ऐसी ही एक प्राचीन बैटरी से निरंतर जलते दीप को देखने का उल्लेख किया।

2. बौधायन शुल्ब सूत्र, ज्यामितीय प्रमेय और पाई (π) का कूटबद्ध मान

यूक्लिडियन ज्यामिति के उद्भव से सदियों पूर्व, भारत में यज्ञ वेदियों के निर्माण के लिए 'शुल्ब सूत्र' नामक गणितीय शाखा का विकास हो चुका था। कल्प वेदांग के हिस्से के रूप में संकलित 'बौधायन शुल्ब सूत्र' (लगभग 800–740 ईसा पूर्व) समकोण त्रिभुज के कर्ण और भुजाओं के संबंध को स्पष्ट करने वाला विश्व का सबसे प्राचीन उपलब्ध दस्तावेज है, जिसे आज संपूर्ण विश्व 'पाइथागोरस प्रमेय' के नाम से जानता है।

दीर्घस्याक्षणया रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यङ्मानी च यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति॥

इसका ज्यामितीय अर्थ है कि आयत के विकर्ण पर बनने वाले वर्ग का क्षेत्रफल, उसकी लंबाई (पार्श्वमानी) और चौड़ाई (तिर्यङ्मानी) द्वारा पृथक-पृथक बनाए गए वर्गों के क्षेत्रफल के योग के बराबर होता है — अर्थात a² + b² = c²। बौधायन के पश्चात आपस्तम्ब (600 ईसा पूर्व) और कात्यायन (200 ईसा पूर्व) ने इसके कई व्यावहारिक ज्यामितीय प्रमाण दिए।

शुल्ब सूत्रों में वर्ग को समान क्षेत्रफल वाले वृत्त में बदलने (और इसके विपरीत) के सिद्धांत भी मिलते हैं। बौधायन ने π का व्यावहारिक सन्निकटन इस प्रकार दिया:

π ≈ 4 × (13/15)² ≈ 3.00444

भारत की इस ज्यामितीय सूक्ष्मता का एक और उदाहरण 'कटपयादि' (Katapayadi) नामक संस्कृत कूट लेखन प्रणाली में मिलता है, जहाँ व्यंजनों को विशिष्ट अंकों से प्रतिस्थापित कर गूढ़ गणितीय सत्यों को भक्ति श्लोकों में छिपाया जाता था:

गोपीभाग्यमधुव्रात-शृङ्गिजोधधिसन्धिगा। खलजीवितखातात गलहालारसंधर॥

इस श्लोक में कटपयादि नियम लागू करने पर π/10 का मान दशमलव के 32 स्थानों तक प्राप्त होता है:

π/10 = 0.31415926535897932384626433832792

व्यंजन वर्ण समूहनिरूपित अंक मान
का, टा, पा, या1
खा, ठा, फा, रा2
गा, डा, बा, ला3
घा, ढा, भा, वा4
ङा, णा, मा, सा5
चा, ता, ष6
छा, था, सा7
जा, दा, हा8
झा, धा9
शून्य (Kha)0

यह कूट प्रणाली दर्शाती है कि प्राचीन भारत में धर्म और व्यावहारिक विज्ञान किस प्रकार आपस में जुड़े हुए थे।

3. जावर का जस्ता धातुकर्म और अधोमुखी आसवन तकनीक (Zawar Zinc Extraction)

धातुकर्म के इतिहास में धात्विक जस्ता (Metallic Zinc) का पृथक्करण सबसे चुनौतीपूर्ण तकनीकों में से एक रहा है। जस्ता अयस्क का अपचयन 1000°C से अधिक तापमान पर संभव है, परंतु शुद्ध धात्विक जस्ता केवल 907°C पर उबलकर वाष्प बन जाता है। इस जटिलता के कारण पश्चिमी देश 18वीं शताब्दी (1743 ईस्वी) से पूर्व व्यावसायिक स्तर पर शुद्ध जस्ता नहीं बना सके थे।

राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित 'जावर' (Zawar) के पुरातात्विक उत्खनन ने प्रमाणित किया है कि भारत कम से कम पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व (लगभग 750 ईसा पूर्व) से बड़े पैमाने पर शुद्ध जस्ता का उत्पादन कर रहा था। इसके लिए 'तिर्यक्पातन यंत्र' या 'अधोमुखी आसवन' (Downward Distillation) तकनीक का उपयोग होता था:

  • अयस्क का भर्जन: जस्ता अयस्क (स्फैलेराइट) को पीसकर हवा में गर्म कर जस्ता ऑक्साइड में बदला जाता था।
  • चार्ज की तैयारी: भर्जित अयस्क को कोयला पाउडर, नमक और सुहागे के साथ मिलाकर 5-10 mm की गोलियों में ढाला जाता था।
  • रिटॉर्ट संरचना: गोलियों को बैंगन के आकार के मिट्टी के बर्तनों (750-2000 cc क्षमता) में भरा जाता था, जिन पर हल्दी का लेप लगाया जाता था।
  • अधोमुखी आसवन: रिटॉर्ट्स को उल्टा कर भट्टी में रखा जाता था; ऊपर 1100°C से अधिक तापमान और नीचे पानी होता था, जिससे जस्ता वाष्प बिना ऑक्सीकृत हुए सीधे ठोस धातु में संघनित हो जाती थी।

वर्ष 2016 में भारतीय भूवैज्ञानिक सोसायटी द्वारा जावर को 'राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक विरासत स्थल' घोषित किया गया।

4. दक्षिण भारतीय वूट्ज़ स्टील और प्राचीन नैनो-प्रौद्योगिकी (Wootz Crucible Steel)

मध्यकालीन यूरोप में क्रूसेडर्स का सामना जब सीरिया में दमिश्क की तलवारों से हुआ, तो वे उनकी अद्वितीय धार और लहरदार संरचना देखकर चकित रह गए। इनके लिए उत्कृष्ट लौह पिंडों का आयात दक्षिण भारत (तमिलनाडु के कोडुमनल, मेल-सिरुवलुर, थेलंगानूर) से होता था, जहाँ इसे 'वूट्ज़' कहा जाता था — यह शब्द कन्नड़ के 'उक्कु' या तमिल के 'उरुक्कु' का अंग्रेजी अपभ्रंश है।

वूट्ज़ स्टील की निर्माण प्रक्रिया कम से कम छठी शताब्दी ईसा पूर्व से प्रचलित थी: उच्च शुद्धता वाले लोहे को काओलिन क्ले, चावल की भूसी और जड़ी-बूटियों के साथ मिट्टी के बर्तनों में सील कर मानसूनी पवन-चालित भट्टियों में 1200-1400°C तक गर्म किया जाता था, जिससे 1.0-2.0% कार्बन युक्त हाइपरयूटेक्टॉइड स्टील बनता था।

रासायनिक घटकभार प्रतिशत
संयुक्त कार्बन1.34%
असंयुक्त कार्बन0.31%
सल्फर0.17%
सिलिकॉन0.04%
आर्सेनिक0.03%

वर्ष 2006 में 'नेचर' पत्रिका में प्रकाशित प्रो. पीटर पॉफ्लर के शोध के अनुसार, इस थर्मल साइकिलिंग प्रक्रिया ने अनजाने में दुनिया की पहली 'नैनो-प्रौद्योगिकी' को जन्म दिया — भारतीय लौह अयस्क में उपस्थित वैनेडियम और टंगस्टन उत्प्रेरक का कार्य करते हुए स्टील में कार्बन नैनोट्यूब और सीमेंटाइट नैनोवायर्स का जाल बनाते थे। वर्ष 327 ईसा पूर्व में राजा पोरस ने सिकंदर के साथ संधि में सोने-चांदी के बजाय 30 पाउंड वूट्ज़ स्टील भेंट किया था। माइकल फैराडे ने भी 1819-1822 के बीच इस स्टील की संरचना दोहराने के कई असफल प्रयास किए।

5. आचार्य पिंगल की द्विआधारी प्रणाली, मेरु प्रस्तार और द्विपद सिद्धांत

आधुनिक द्विआधारी संख्या प्रणाली (Binary Number System) का श्रेय आमतौर पर गॉटफ्राइड लीबनिज को दिया जाता है। परंतु आचार्य पिंगल (लगभग तीसरी-दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) ने अपने ग्रंथ 'छन्दःशास्त्र' में बाइनरी कोडिंग के मूलभूत सिद्धांत बहुत पहले प्रतिपादित कर दिए थे — संस्कृत छंदों के वर्गीकरण के लिए 'लघु' (बाइनरी 1) और 'गुरु' (बाइनरी 0) का उपयोग करते हुए, और 'प्रस्तार' नामक एल्गोरिथ्म द्वारा सभी संभावित संयोजन व्यवस्थित किए, जो आज की 'ट्रुथ टेबल' के समतुल्य है।

पिंगल के इन सूत्रों को आगे कई भारतीय गणितज्ञों ने विकसित किया:

  • वीरसेन (800 ईस्वी): 'धवला' ग्रंथ में द्विआधारी लघुगणक के लिए 'अर्धच्छेद' प्रणाली विकसित की।
  • वीरहाङ्क (छठी-आठवीं शताब्दी): लघु-गुरु छंदों की गणना से वह अनुक्रम प्रस्तुत किया जिसे आज 'फाइबोनैचि अनुक्रम' कहा जाता है (fₙ₊₂ = fₙ₊₁ + fₙ)।
  • हलायुध (10वीं शताब्दी): द्विपद गुणांकों का त्रिकोणीय विन्यास 'मेरु प्रस्तार' प्रस्तुत किया, जिसे यूरोप में 600 वर्ष बाद 'पास्कल का त्रिकोण' नाम दिया गया।
  • गोपाल व हेमचंद्र (1089-1172 ईस्वी): सामान्यीकृत संयोजनों से 'गोपाल-हेमचंद्र अनुक्रम' विकसित किया, जिसे बाद में नारायण पंडित ने 'गणित कौमुदी' (1356 ईस्वी) में 'गाय और बछड़े की समस्या' से विस्तार दिया।

6. महर्षि कणाद का वैशेषिक परमाणुवाद और यथार्थवादी भौतिकी

यूनानी दार्शनिक डेमोक्रिटस के परमाणु सिद्धांत से सदियों पूर्व, 'वैशेषिक संप्रदाय' के संस्थापक महर्षि कणाद (लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व) ने अपने ग्रंथ 'वैशेषिक सूत्र' में यथार्थवादी भौतिकी के सिद्धांत स्थापित किए। उन्होंने ब्रह्मांड की व्याख्या के लिए छह मूलभूत श्रेणियां दीं — द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय — और 'द्रव्य' को नौ उप-श्रेणियों (पृथ्वी, जल, तेजस, वायु, आकाश, दिक्, काल, मन, आत्मा) में बांटा।

कणाद का परमाणु सिद्धांत निम्न बिंदुओं पर आधारित था:

  • परमाणु की सूक्ष्मता और नित्यता: हर वस्तु अविभाज्य, अदृश्य, शाश्वत कणों ('परमाणु') से बनी है।
  • आणविक संयोजन: दो परमाणु मिलकर 'द्व्यणुक', तीन द्व्यणुक मिलकर 'त्र्यणुक' बनाते हैं।
  • गोलाकार अपरिवर्तनीयता: परमाणु सभी दिशाओं से समान होने के कारण गोलाकार माना गया।
  • वेग और गति सिद्धांत: बल और गति के संबंध को 'वेग' की अवधारणा से स्पष्ट किया।

ग्रीक भौतिकविदों के विपरीत, कणाद का सिद्धांत मानता था कि तत्वों के परमाणु गुणात्मक रूप से भी भिन्न होते हैं, जो भौतिकी और रसायन शास्त्र के बीच एक पुल का कार्य करता है।

7. संगमग्राम के माधव और केरल स्कूल ऑफ कैलकुलस

कलन (Calculus) के विकास का श्रेय सामान्यतः न्यूटन और लीबनिज को दिया जाता है। परंतु केरल के गणितज्ञ-खगोलशास्त्री संगमग्राम के माधव (1340-1425 ईस्वी) ने न्यूटन के जन्म से लगभग तीन शताब्दी पूर्व ही कैलकुलस और अनंत श्रेणियों की मूल अवधारणाओं का विकास कर लिया था। माधव की खोजें उनके शिष्यों के ग्रंथों — ज्येष्ठदेव की 'युक्तिभाषा' और शंकर वारियर की 'युक्ति-दीपिका' — में सुरक्षित हैं।

माधव-ग्रेगरी arctangent श्रेणी:

arctan(x) = x − x³/3 + x⁵/5 − x⁷/7 + … (जहाँ |x| ≤ 1)

माधव-न्यूटन sine एवं cosine श्रेणियां:

sin(θ) = θ − θ³/3! + θ⁵/5! − θ⁷/7! + …

cos(θ) = 1 − θ²/2! + θ⁴/4! − θ⁶/6! + …

माधव की सबसे क्रांतिकारी देन उनकी श्रेणियों के लिए 'त्रुटि संशोधन पद' (Error Correction Term) की अवधारणा थी, जिससे केवल 21 पदों के योग से ही उन्होंने π का मान दशमलव के 11 स्थानों तक (3.14159265359) और बाद में 13 स्थानों तक अत्यंत शुद्धता से परिकलित किया।

8. सुश्रुत संहिता: शल्य चिकित्सा, संज्ञाहरण और धूपन रोगाणुशोधन

प्राचीन भारतीय चिकित्सा विज्ञान का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ 'सुश्रुत संहिता' (लगभग 1000-600 ईसा पूर्व) शल्य चिकित्सा के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण विलेख है। सुश्रुत को 'शल्य चिकित्सा का जनक' और 'प्लास्टिक सर्जरी का जनक' माना जाता है।

  • त्रिविध कर्म: शल्य प्रक्रिया को पूर्वकर्म, प्रधानकर्म और पश्चात्कर्म — तीन चरणों में विभाजित किया।
  • संज्ञाहरण: 'सम्मोहिनी' और 'संजीविनी' जड़ी-बूटियों से बनी संज्ञाहरण औषधियों का उपयोग किया, जो आधुनिक एनेस्थीसिया का अग्रदूत मानी जाती हैं।
  • राइनोप्लास्टी: माथे या गाल की त्वचा का फ्लैप लेकर नाक के आकार में प्रत्यारोपित करने की तकनीक आज भी रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी का आधार मानी जाती है; त्वचा के सिरे जोड़ने के लिए काली चींटियों के जबड़ों का स्टेपलर की तरह उपयोग किया जाता था।
  • धूपन कर्म: गुग्गुलु, अगरु, राल, वचा और नीम के धुएं से घाव व शल्य कक्ष का रोगाणुशोधन किया जाता था; शंखिनी, अंकोथ, अमलतास के काढ़े से 'शोधन कषाय' बनाया जाता था।
  • हंसोदक: सूर्य और चंद्रमा की किरणों से प्राकृतिक रूप से शुद्ध जल का उपयोग शल्य चिकित्सा में किया जाता था।

यह ज्ञान 8वीं शताब्दी में बगदाद के खलीफा हारून अल-रशीद के संरक्षण में संस्कृत से अरबी भाषा में 'किताब-ए-सुसरुद' के रूप में अनूदित हुआ, जिसने यूरोपीय चिकित्सा के विकास को प्रभावित किया।

9. दिल्ली का लौह स्तंभ और प्राचीन भारतीय जंग-रोधी धातुकर्म

दिल्ली के महरौली स्थित कुतुब मीनार परिसर में खड़ा 7.2 मीटर ऊंचा और लगभग 6 टन वजनी 'लौह स्तंभ' प्राचीन भारतीय संक्षारण विज्ञान (Corrosion Science) का उत्कृष्ट उदाहरण है। गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (c. 375-415 ईस्वी) के काल में निर्मित यह स्तंभ 1600 से अधिक वर्षों से खुले वातावरण में बिना जंग लगे खड़ा है।

इसका निर्माण 18-23 किलोग्राम वजन के कच्चे लोहे के पिंडों को जोड़कर 'फोर्ज वेल्डिंग' तकनीक से किया गया। आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर आर. बालसुब्रमण्यम के शोध के अनुसार, लोहे में मौजूद फास्फोरस (0.25%) की उच्च मात्रा और सल्फर-मैंगनीज की नगण्य उपस्थिति इसके जंग-रोधी होने का मुख्य कारण है — नमी के संपर्क में आने पर सतह पर आयरन हाइड्रोजन फास्फेट हाइड्रेट की सुरक्षात्मक परत ('मिसावाइट') बन जाती है।

इस कौशल के अन्य उदाहरण: धार का लौह स्तंभ (c. 1010-1053 ईस्वी), कोणार्क सूर्य मंदिर की लौह कड़ियां (c. 1250 ईस्वी), और कोल्लुर का आदि-मूकम्बिका लौह स्तंभ जो तटीय नमकीन हवाओं के बावजूद सुरक्षित है।

10. धोलावीरा की जल संचयन प्रणाली और सिंधु घाटी की हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख नगर 'धोलावीरा' (कच्छ, गुजरात) की नगर योजना वर्षा जल संचयन का प्राचीनतम और सबसे परिष्कृत उदाहरण है। लगभग 3000-1500 ईसा पूर्व का यह नगर मात्र 300 mm औसत वार्षिक वर्षा वाले शुष्क द्वीप 'खादिर बेट' पर बसा हुआ था।

जल संरचनाआयाम व विशेषता
महा-जलाशय (पूर्वी किला)73.5m × 29.3m, 7m गहरा; जिप्सम-चिकनी मिट्टी का अस्तर
एनेक्स जलाशय79m लंबा, 7m गहरा; जीवित चट्टान काटकर निर्मित
महा-बावड़ीमोहनजोदड़ो के विशाल स्नानागार से तीन गुना बड़ी; बिटुमेन वाटरप्रूफिंग

नगर का 13 मीटर का प्राकृतिक ढलान उपयोग कर जलाशयों को श्रेणीबद्ध (कैस्केड) किया गया, जिससे तलछट पहले ही बैठ जाती थी। मौसमी नदियों मनहर और मनसर पर चेक डैम बनाकर जल को नहरों से जलाशयों में मोड़ा जाता था। व्यापार के लिए द्विआधारी (1:2:8:16:32:64) और दशमलव (160,200,320,640) — दोनों बाट प्रणालियों का सटीक उपयोग होता था।

निष्कर्ष

प्राचीन भारतीय विज्ञान और तकनीकी का यह विश्लेषण दर्शाता है कि भारत की प्राचीन मेधा प्रत्यक्ष प्रयोगों, टिप्पणियों और गणितीय परिशुद्धता पर आधारित थी। इन विस्मृत तकनीकों का पुनर्मूल्यांकन इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में स्थापित करने के साथ-साथ आज के पर्यावरण और जल प्रबंधन जैसी समस्याओं के समाधान के लिए भी प्रासंगिक है।